जब ख़त्म हो जाये राहें, और मंजिल भी हो जाये ओझल,
जब कांटे रास्तो के पैरों को कर जाएँ घायल,
और कट जाये पतंग जीवन की, आशाओं की डोर से टूटकर,
तब कर देना तू खुद को हवा के सहारे, और चल देना जहाँ लेकर हवा चले,
कुछ देर यूँ बहना हवा में मस्त होकर, फिर गिर जाना धरा पे तू शांत होकर,
सोचना जो तूने किया वो भी कम नहीं है, चलने का गौरव भी मंजिल पाने से कम नहीं है !
Thursday, November 3, 2011
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

No comments:
Post a Comment